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Qaza Namaz Padhne Ka Tarika

Qaza Namaz Padhne Ka Tarika

आज के इस टॉपिक में हम बात करने वाले हैं कि Qaza Namaz Padhne Ka Tarika क्या है कजा नमाज किस तरह पढ़ते हैं जो हमारी नमाजे काज हो चुकी हैं और उसको हम पढ़ना चाहते हैं तो उन Qaza Namazon ko kaise padhe, कजा नमाज पढ़ने का वक्त क्या है इन सब चीजों के बारे में हम डिटेल से इस पोस्ट में बात करने वाले हैं।

बिना किसी शरई वजह से नमाज कजा कर देना बहुत सख्त गुनाह है नमाज छोड़ देने वाले पर फर्ज है कि उसकी क़जा पढ़े और सच्चे दिल से तौबा करें,

Qaza Namaz kya hai ?

कजा यह है कि जिस बात का अल्लाह ने बंदे को हुक्म दिया है उस काम को वक्त पर पूरा करने को अदा कहते हैं और वक्त निकल जाने के बाद उस काम को करने को कजा कहते हैं।

क़जा नामाजों में सिर्फ फर्ज नमाजें और वित्र की वाजिब नमाज की क़ज़ा पढी जाएगी ! लेकिन सबसे पहले ज़रूरी है कि क़ज़ा नमाज़ो का हिसाब करके उसे नोट कर लें, बालिग होने के बाद जितनी नमाज़े क़ज़ा हुई उनको अलग अलग लिख लें

यानी फज़्र की कजा और जोहर ,असर,मग़रिब और इशा और वित्र की छूटी हुई नमजों की कुल तादाद लिख ले

क़ज़ा नमाज़ो का हिसाब अन्दाजे से किया जा सकता है । की हमारी फज्र की बालिग होने से लेकर आज तक कितनी नामाजें कजा हुई है उसी हिसाब से एक अंदाज़ा कर ले namazon ki tadaad ज्यादा हो जाए कोई हरज नहीं लेकिन कम नहीं होनी चाहिए। 

Baalig hone ki umar

बहुत से लोगों को यह अंदाजा नहीं हो पाता कि हम अपनी नमाजो को कब से कब से शुरू करें कि कब से मेरी नमाज छूटी है

आदमी चाहे औरत हो या मर्द जब से बालिग होता है उस पर नमाज रोजा वगैरह फर्ज हो जाता है बालिग होने की को उम्र शरीयत में बताई गई है औरत कम से कम 9 बरस से और ज्यादा से ज्यादा 15 साल में बालिग हो जाती है और आदमी कम से कम 12 साल और ज्यादा से ज्यादा 15 साल में बालिग हो जाता है 15 साल की उम्र वाले को चाहे मर्द हो या औरत शरीयत में बालिग माना जाता है बालिग होने की निशानियां उसमें पाई जाती हो या ना पाई जाती हो।

Qaza namaz padhne ka waqt

कजा नमाज पढ़ने के लिए कोई टाइम फिक्स नहीं है मुकर्रर नहीं है सारी जिंदगी में चाहे जब पढ़ ले उसके उपर से कजा का बोझ उतर जाएगा लेकिन अगर सूरज निकलने, और सूरज डूबने, या जवाल के वक्त (दिन में 11:30 से 12:30 के बीच का वक़्त) में पढ़ी तो नमाज़ नहीं होगी क्योंकि इन वक्तों में नमाज पढ़ना जायज नहीं है। इसीलिए सूरज तुलु होते वक्त,और सूरज गुरूब होते वक्त और जवाल के वक्त नमाज़ नहीं अदा करनी चाहिए ये मकरूह वक्त होता है।

इसके अलावा कजा नमाज पढ़ने क्या का वक्त कोई नहीं है जिस वक्त भी जिस वक्त भी चाहे पड़ सकता है जैसे ज़ुहर की फ़र्ज़ नमाज कजा हो गई अब चाहे तो उसी वक्त पढ़ ले या किसी और वक्त में पढ़ ले ज़ुहर की कजा नमाज़ अदा हो जाएगी। लेकिन असर के वक्त में असर की नमाज के अलावा कोई दूसरी नमाज ना पढ़े।

जैसे आपने हिसाब किया कि फज़्र की क़ज़ा नमाज की तादाद एक हजार है , 

zuhar ki qaza namaz एक हजार है ! इसी तरह से तमाम नमाजो की तादाद हिसाब करके लिख लें फिर आप 

फज़्र के वक्त  fazr ki qaza namaz जोहर के वक्त ,zuhar ki qaza namaz ,मगरिब के वक़्त मगरिब की कजा नामज, इसी तरह बकी नमाज़ो की क़जा पढते रहे

जो नमाज जिस तरीके से छूटी है उसकी क़जा भी उस तरीके से पढ़ना पड़ेगा जैसे -सफर में जो नमाज कजा हुई है तो 4 रकात वाली नमाज 2 रकात ही पढ़ी जाएगी

Qaza namaz ki niyat

जिस आदमी के ऊपर सालों की नमाज़ कजा हो और ठीक तरीके से उसे याद ना हो कि हमारी कितने दिन की नमाज और कौन-कौन सी नमाज कजा हुई है तो वह इस तरह नियत करके नमाज पड़ेगा।qaza namaz ki niyat इस तरह करें

नियत करता हूं/करती हूं मैं सबसे पहले फज्र की जो मुझसे क़जा हुई उसको अदा करने की वास्ते अल्लाह के मुंह मेरा काबा शरीफ की तरफ अल्लाह हु अकबर

या सबसे पहली जुहर की या असर की या और किसी दूसरे वक्त की नमाज की अदा पढ़ने चाहे तो उसकी नियत इसी तरह  करें इसी तरह हर नमाज़ में नियत करते रहें फज़्र की पढना हो तो फज़्र का नाम लें , जुहर की पढना हो तो जुहर इसी तरह अस्र , मगरिब , इशा और वित्र की कजा पढ़ना हो तो वित्र का नाम लेकर नियत करें ,और इसी तरह सब नमाजो की कजा पढ़ ले यहां तक कि यकीन हो जाए कि सब कजा नमाज़ अदा हो गई है।

याद रखे फर्ज की क़जा फर्ज है वाजिब की कजा वाजिब है ,और सुन्नत की कजा सुन्नत है

Fazr ki qaza namaz padhne ka tarika

अगर किसी वजह से आपकी फज्र की नमाज़ छूट गई अब fazr ki qaza namaz पढ़ना है तो उसके लिए सूरज निकालने तक का इंतिजार करना होगा सूरज निकलने के बाद fazr ki qaza namaz ki niyat करके नमाज़ अदा की जाएगी

Fazr ki qaza namaz ki niyat

नियत करता हूं मैं 2 रकात नमाज फज्र की कजा वास्ते अल्लाह के मुंह मेरा काबा शरीफ की तरफ अल्लाह हू अकबर

ज़ुहर से पहले अगर fazr ki Qaza namaz पढ़ेंगे तो दो सुन्नत दो फ़र्ज़ पढ़ना होगा

अगर ज़ुहर के वक़्त या किसी और वक़्त में अदा करेंगे तो सिर्फ दो फ़र्ज़ अदा करना होगा सुन्नत नहीं ।

अगर किसी वजह से आपकी  

ज़ुहर की नमाज़ छूट जाती है और ज़ुहर का पूरा वक़्त निकल जाता है तो ज़ुहर की चार रकअत नमाज़ की कजा मग़रिब में पढे या इशा में असर में नहीं।

याद रहे असर के वक़्त असर की नमाज़ के आलावा और कोई भी नमाज़ नहीं पढ़ी जाती है बाकि नमाज़ किसी भी वक़्त अदा कर सकते है 

कजा नमाज नवाफिल से ज्यादा अहम है यानी जिस वक्त आप नफिल नमाज़ पढ़ते हैं उस वक्त आप उसके बदले में कजा नमाजो को पढ़ सकते हैं जब तक आपकी फर्ज कजा नमाज मुकम्मल नहीं होगी , तब तक आप की नवाफिल कुबूल नहीं होगी । इसीलिए अपनी काज़ाए उमरी को इन नफ़िल नामजों की जगह पढ़ कर मुकम्मल कर ले।

jazakalla hu khair

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